कोरोना से जागृत करने वाले आई एम ए के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ के के अग्रवाल को फरीदाबाद निवासी कवित्री सलोनी की श्रद्धांजलि कविता 

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डॉ. के के अग्रवाल को श्रद्धांजलि
                                   सलोनी चावला
चंद रह गई थीं सांसें  अपनी ,
फिर भी दूजों को साँसें दीं ।
थी आशा नहीं खुद जीने की,
फिर भी दूजों को आशा दी !!
तुम वह गुल थे जो मुर्झा रहे थे ,
पर जीवन की खुशबू फैला रहे थे।
थी मौत खड़ी तुम्हारे दर पर ,
और तुम दूजों को उससे बचा रहे थे !!
तुम्हारी हर डूबती हुई सांस ,
हर नई सांस को जन्म देती रही।
तुम्हारी ज़िदगी की रात अमावस थी,
पर वह दूसरों को रौशनी देती रही !!
यह मौत नहीं …….  है  वीरगति ,
तुम दवा के क्षेत्र के फौजी थे।
टूटी नावों को दिया  किनारा ,
तुम वह ज़ख़्मी मांझी थे !!
लाखों सलाम डॉक्टर  अग्रवाल ,
तुम डॉक्टर से ज़यादा फ़रिश्ते थे।
मेडिकल फील्ड से बाद में ,
पहले इंसानियत से तुम्हारे रिश्ते थे !!
खुद के लंग्स में न्युमोनिया लेकर ,
लाखों लंग्स को मज़बूत किया।
जाते – जाते कुछ कर जाऊं ,
पल – पल यही संकल्प किया !!
तुम्हारे फ़र्ज़ की इंतिहा ने ,
मानवता का पैगाम दिया।
तुम्हारी इंसानियत की इन्तिहा ने ,
मेरी आत्मा को झकझोर दिया !!
तुम अमर हो गए डॉ अग्रवाल ,
कुछ ऐसा फ़र्ज़ निभा कर अपना।
सच्चे मायने से तुमने ,
जीवन सार्थक किया अपना !!
ऐसे मोती बहुत कम मिलते हैं ,
जहाँ – ए – सागर  में ।
पर जब मिलते हैं तो खूब ,
चमकते हैं हर दिल -ए -घर में !!
कहने को तो कलयुग है यह ,
पर देवता अभी भी ज़िंदा हैं।
शायद इसीलिए दुनिया में ,
अभी तक , मानवता ज़िंदा है !!
यह कविता , डॉ अग्रवाल को श्रद्धांजलि के साथ साथ उस हर
 इन्सानियत से भरे डॉक्टर , स्वास्थय कर्मचारी और आम
इंसान के लिए सैल्यूट है ,जो निःस्वार्थ भाव से आज मानव सेवा
कर रहा है।
     डॉ अग्रवाल पर एक शेर
गुल मुर्झा गए तो क्या , खुशबू इनमे भी होती है,
रात अमावस भी हो तो , दीवाली जगमग होती है।
डॉ अग्रवाल की ज़िन्दगी भले ही अमावस हो गई , पर वह लाखों
की ज़िन्दगी जगमग कर गए।
                                                              सलोनी चावला

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