दुबई में ‘नरेश यादव’ बन कर रहता था हरियाणा का कुख्यात गैंगस्टर कौशल

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Faridabad: हरियाणा के मोस्ट वांटेड गैंगस्टर कौशल ने साल 2015 में ही विदेश भागने की योजना बना ली थी। सूत्रों के मुताबिक साल 2015 तक कई बड़ी वारदातों को अंजाम देकर वह पुलिस की नजर में आ गया था। दो साल तक वह शांत रहा और छोटी-मोटी वारदातों को अंजाम दिया। इस दौरान वह विदेश भागने की तैयारी करता रहा। बीच में कुछ दिन वह थाईलैंड घूमकर आया। वहां उसने विभिन्न जगहों पर मोबाइल में अपनी फोटो ले लीं। वहां से सिम भी ली। इसके बाद वापस भारत लौट आया। यहां जयपुर से फर्जी पासपोर्ट बनवा लिया। नए पासपोर्ट में उसने अपना नाम नरेश यादव रखा। इसी पासपोर्ट से वह दुबई पहुंच गया। वहां रहकर वह थाईलैंड में खींचे गए अपने फोटो सोशल मीडिया पर वायरल करता था, ताकि पुलिस को उसके दुबई में होने की भनक ना लगे। दुबई में वह नरेश यादव बनकर ही रह रहा था। वह इंटरनेशनल सिटीजनशिप के लिए भी प्रयास कर रहा था।

पुलिस सूत्रों के मुताबिक, दुबई में एक भारतीय लंबे समय से रह रहा है। वहां दुकान चलाता है। कौशल ने उस शख्स से जान पहचान निकाली। उसी शख्स ने कौशल के दुबई में रुकने का बंदोबस्त किया। कौशल वहां एक अपार्टमेंट में किराये पर रह रहा था। वहां वह न केवल जिम जाता था, बल्कि शहर में घूमता फिरता भी था। वहीं से वह ऑडियो रिकॉर्डिंग कर गुरुग्राम और फरीदाबाद में कारोबारियों को भेजकर रंगदारी मांगता था। वाट्सएप और इंटरनेट कॉलिंग के जरिए अपने गुर्गों को निर्देश देता था। गुरुग्राम व एसटीएफ ने करीब कुछ महीने पहले दुबई में छापेमारी की थी। तब कौशल उनके हत्थे नहीं चढ़ा था, मगर उसे भनक लग गई थी कि पुलिस उसके पीछे पड़ गई है। इसके बाद वह सतर्क हो गया। यहां तक कि उसने अपार्टमेंट से निकलना और जिम जाना भी बंद कर दिया था।

कौशल का अपराध का तरीका एकदम अलग था। वह वारदात को अंजाम देने वाले अपने गुर्गों से सीधी बात नहीं करता। वह डायरेक्ट नहीं, वाया बात करता रहा है। जिस इलाके में वह रहता है, उस इलाके के नंबर का इस्तेमाल कतई नहीं करता। दुबई में रहने के बाद भी उसने कभी वहां के नंबर का इस्तेमाल नहीं किया। वैसे भी दुबई में वाट्सएप कॉल पर प्रतिबंध है। उसने वहां से भी भारतीय नंबर से ही कॉल किया।

सूत्र बताते हैं कि कौशल गैंग के काम करने के अंदाज से अपराध जगत के लोग काफी प्रभावित हैं। बड़ी से बड़ी वारदात को अंजाम देने की भनक पुलिस को नहीं लगती। इसके पीछे मुख्य कारण यही है कि गैंग में वारदात को अंजाम देने वाली टीम अलग है, रेकी करने वाली टीम अलग है, बचाव टीम अलग है। जब भी कोई टीम कहीं वारदात को अंजाम देने के लिए पहुंचती है, उसके आस-पास एक बचाव टीम भी तैयार रहती है। यही वजह है कि वारदात को अंजाम देने वाले गुर्गों तक आसानी से पुलिस नहीं पहुंच पाती है।

पिछले कुछ सालों के दौरान जितने भी गैंगस्टर मुठभेड़ में मारे गए, सभी के गैंग के गुर्गे कौशल गैंग में शामिल हो चुके हैं। इससे अंदाजा लगाना मुश्किल है कि गैंग में कितने गुर्गे हैं। इसका अंदाजा तब लगा, जब तीन महीने पहले गुरुग्राम पुलिस के ऑपरेशन क्लीनअप के तहत 10 से अधिक कुख्यात शूटर पकड़े गए। उसके बाद भी गैंग की ताकत कम नहीं हुई। फरीदाबाद में कांग्रेस नेता विकास चौधरी की सरेआम दिनदहाड़े हत्या करने का आरोप भी गैंग के ऊपर लगा।

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